चेतावनी: आर्कटिक में दोगुना तेजी से पिघल रहा है बर्फ का पहाड़, बहुत बड़े खतरे की तरफ बढ़ी दुनिया

नई दिल्ली: आर्कटिक में मौजूद बर्फ के पहाड़ काफी तेजी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि उन्होंने जो अनुमान लगाया था, उससे दोगुनी तेजी से बर्फ का पिघलना जारी है और दुनिया के लिए बहुत बड़े खतरे का अलार्म बज रहा है। लेकिन, दुनिया उस चेतावनी को मानने के लिए तैयार ही नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक आर्कटिक के समुद्र में मौजूद बर्फ की शिलाएं काफी तेजी से पिघल रही हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से आर्कटिक में मौजूद बर्फ की बड़ी बड़ी चट्टानें काफी तेजी से पिघल रही हैं। इसकी वजह पृथ्वी के तापमान का लगातार बढ़ना है। रिपोर्ट के मुताबिक ये एक बहुत बड़े खतरे की निशानी है क्योंकि आर्कटिक में मौजूद बर्फ सूरज के बढ़ते तापमान की वजह से पिघल रहे हैं और पूरी पृथ्वी के लिए ये एक बहुत बड़े खतरे की बात है। तेजी से बर्फ के नुकसान का मतलब है कि चीन से यूरोप के लिए उत्तर-पूर्वी शिपिंग मार्ग को पार करना आसान हो जाएगा, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि इससे तेल और गैस भी काफी तेजी से पृथ्वी के बाहर आएगा।
अब तक सैटेलाइट रडार के द्वारा समुद्र में मौजूद बर्फ की बड़ी बड़ी चट्टानों के पिघलने की घटना को मापा जाता था लेकिन वैज्ञानिकों ने ताजा खुलासे में कहा है कि सैटेलाइट से बर्फ के पिघलने का अनुमान लगाना काफी मुश्किल होता है और उससे पता नहीं चल पाता है कि वास्तव में कितना बर्फ पिघल रहा है। अब तक बर्फ के पिघलने की गति को सोवियत रूस के अभियानों से मापा जाता था। ये माप 1954 से 1991 में तक की गई। लेकिन, क्लाइमेट क्राइसिस ने काफी तेजी से बदलना शुरू कर जिया है और अब अनुमान लगाया गया है कि अब तक जो आंकड़े हमारे पास आ रहे थे उनमें काफी कमियां हैं और वो काफी पुरानी हैं।

आर्कटिक में बर्फ पिघलने की घटना को अब आधुनिक कंप्यूटर मॉडल द्वारा मापा जाता है। साल 2002 से 2018 के बीच आधुनिक कंप्यूटर प्रणाली द्वारा आर्कटिक में बर्फ पिघलने की घटना को मापा गया है। जिसमें तापमान, बर्फबारी और बर्फ के बहाव को भी शामिल किया गया है। समुद्री बर्फ की मोटाई की गणना के लिए इस डेटा का इस्तेमाल करने से पता चलता है कि यह मध्य आर्कटिक के आसपास के समुद्रों में पहले की तुलना में दोगुना तेजी से बर्फ पतला हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक आर्कटिक ध्रुप में मौजूद बर्फ का एक बड़ा हिस्सा तेजी से पिघल रहा है। इस रिसर्च को अंजाम देने वाले यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफेसर मॉबी मैलेट ने कहा कि ‘समुद्र में मौजूद बर्फ की मोटाई आर्कटिक के लिए बेहद संवेदनशील बात है और बर्फ की मोटाई से ही आर्कटिक की स्थिति का आंकलन किया जाता है।’ उन्होंने कहा कि ‘मोटी बर्फ एक इन्सुलेट कंबल के तौर पर काम करती है, जो समुद्र को सर्दियों में वातावरण को गर्म करने से रोकती है और गर्मियों में समुद्र को धूप से बचाती है। ऐसे में गर्मी बढ़ने से आर्कटिक में मौजूद बर्फ काफी तेजी से पिघलेगी और समुद्र में बाढ़ आने का खतरा काफी तेजी से बढ़ेगा और इसका अंजाम जाहिर तौर पर हमें ही भुगतना होगा।’ माना जाता है कि आर्कटिक में आया परिवर्तन, उत्तरी गोलार्ध के आसपास के मौसम, जैसे हीटवेव और बाढ़ को काफी ज्यादा प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा कि आर्कटिक में मानवीय गतिविधियां काफी तेज हो चुकी हैं और उसका असर भी आर्कटिक में बर्फ के पिघलने पर पड़ रहा है।

प्रोफेसर मैलेट ने कहा कि ‘ नए रिसर्च से पता चला है कि बर्फ के पिघलने से आर्कटिक में पानी बढ़ेगा, जिससे समुद्र में तूफान आने की संभावना काफी बढ़ जाएगी जो समुद्र के तटीय इलाकों को पूरी तरह से बर्बाद कर देगा। उन्होंने कहा कि ‘इंसान लगातार इन इलाकों में भी तेल और गैस को निकाल रहा है और बड़ी बड़ी कार्गो जहाजों का आना इन इलाकों में तेजी से शुरू हो गया है, जिससे इन क्षेत्रों में काफी ज्यादा प्रदूषण और कचरा फैल रहा है।’ उन्होंने कहा कि ‘आर्कटिक में रूस भी काफी तेजी से तेल और गैस निकालने की कोशिश में है और ताजा अनुमान में पता चला है कि इन सब वजहों से बर्फ के पिघलने की रफ्तार पहले जो अनुमान लगाई गई थी, उससे दोगुनी हो गई है।’ उन्होंने कहा कि ‘आर्कटिक में बर्फ का पिघलना उन देशों के लिए बुरी खबर है, जो यहां पर कई तरह की योजना बना रहे हैं क्योंकि बर्फ की चादर पतली होने से भविष्य में काफी खतरनाक परिस्थितियों का सामना इंसानों को करना पड़ेगा’
प्रोफेसर मैलेट ने कहा कि सोवियत डेटा के आधार पर अब तक आर्कटिक में मौजूद बर्फ की गणना की जाती थी। जिसमें कई बहादुर लोगों को आर्कटिक भेजा जाता था और वो आर्कटिक में बर्फ की शिलाओं पर बैठकर आर्कटिक में तैरते रहते थे। ऐसे लोग कई सालों तक आर्कटिक में रहकर बर्फ की मोटाई को मापने की कोशिश करते थे। लेकिन, 2019 में इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ने इस तरीके से आर्कटिक में मौजूद बर्फ को मापने में कई तरह की कमियों को उजागर किया था। समुद्री बर्फ की मोटाई की गणना उपग्रह राडार डेटा से की जाती है जो यह जानने की कोशिश करता है कि बर्फ, समुद्र की सतह के ऊपर कितनी ऊँचाई पर तैर रही है। लेकिन, हिमपात के दौरान जो बर्फ, बर्फ की चट्टानों पर मौजूद होता है, उसको लेकर राडार गलती कर बैठता है साथ ही समुद्र में बर्फ की चट्टानें कितनी अंदर तक हैं, ये भी पता नहीं चल पाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर साल 2300 ईस्वी तक समुन्द्र का लेवल 1.2 मीटर बढ़ जाएगा वो भी तब जब 2015 पेरिस क्लाइमेट गोल को प्राप्त कर लिया जाएगा और जिस रफ्तार से बर्फ पिघल रही है, उसकी वजह से विश्व के कई बड़े बड़े शहर खतरे में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक शंघाई से लंदन तक हर शहर खतरे में होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक फ्लोरिडा, भारत और बांग्लादेश भी खतरे की टॉप लिस्ट में है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर समुन्द्र में पानी का लेवल 2 मीटर तक बढ़ जाए तो बांग्लादेश और मालदीव जैसे देश पूरी तरह से खत्म ही हो जाएगा।

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