चीन हाथ मलता ही रह गया, नेपाल में भारत को मिल गई बड़ी कूटनीतिक जीत!

काठमांडू: पिछले कुछ सालों से भारत और नेपाल के संबंधों में काफी खटास आई है। खासकर नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान दोनों देशों के संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले। वजह था, नेपाल में पांव पसारता चीन। लेकिन, पिछले एक साल के दौरान नेपाल की राजनीति में काफी झंझावात रहा और अब नेपाल के प्रधानमंत्री बने हैं शेर बहादुर देउबा, जो नेपाल कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं और शेर बहादुर देउबा के प्रधानमंत्री बनते ही नेपाल में भारत को बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत मिल गई है, जबकि चीन हाथ मलता ही रह गया है। नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने सदन में विश्वास मत हासिल करने के बाद भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने की पहली प्राथमिकता व्यक्त की है और उन्होंने चीन को दरकिनार कर दिया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। पिछले कुछ सालों के बाद ये पहला मौका है, जब नेपाल की तरफ से भारत के लिए गर्मजोशी के साथ हाथ बढ़ाया गया है। नेपाल की अब तक की वामपंथी सरकारों ने चीन की तरफ रूझान दिखाया है, ऐसे में नेपाल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद भारत को बड़ी डिप्लोमेटिक जीत हासिल हुई है।

नेपाल ने भारत की तरफ एक कदम बढ़ाया है तो भारत ने भी दो कदम नेपाल की तरफ बढ़ा दिए हैं। भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्वास मत जीतने के बाद नेपाली प्रधान मंत्री देउबा को ट्विटर पर बधाई दी। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद देउबा आधिकारिक तौर पर पांचवीं बार देश के प्रधानमंत्री बने हैं। कैसा रहेगा प्रधानमंत्री देउबा का कार्यकाल? क्या उनके आने से नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का दौर खत्म हो जाएगा? ऐसे कई सवाल अभी भारत के सामने भी हैं, ऐसे में जाहिर है कि नई परिस्थितियों में शेर बहादुर देउबा के सामने भी जटिल चुनौतियां होंगी। आखिर देउबा के सामने क्या चुनौती होगी। उनके प्रधानमंत्री बनने से नेपाल और भारत के संबंध कैसे होंगे, ये भी देखने वाली बात होगी।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बधाई स्वीकार करते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री देउबा ने जवाब में कहा कि, ”मैं दोनों देशों और लोगों के बीच मजबूत संबंध स्थापित करने के लिए आपके साथ काम करना चाहता हूं”। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निचले सदन को बहाल करने के बाद नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा ने अन्य दलों की मदद से आसानी से विश्वास मत हासिल कर लिया है। इस तरह नेपाल में कोरोना महामारी के बीच देश को चुनाव में जाने से बचा लिया गया है। अब देश में चुनाव की जगह छह महीने के लिए नेपाल की सरकार सुरक्षित हो गई है। आपको बता दें कि पहले नेपाल की कमान नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के केपी शर्मा ओली के हाथ में थी, उन पर चीन का प्रभाव है। इसी वजह से भारत के साथ कुछ मुद्दों पर टकराव की स्थिति बन गई थी। नेपाल और भारत के संबंधों पर नजर डालें तो पता चलता है कि केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में दोनों देशों के बीच खटास आ गई थी। कई विवादास्पद मुद्दों पर दोनों देशों के बीच संघर्ष की स्थिति भी पैदा हो गई। ओली को चीन का समर्थक माना जाता है, वह भारत के विरोधी रहे हैं। इससे कई बार ये भी साफ हो गया कि वो सीधे तौर पर चीन के निर्देश पर काम कर रहे हैं। ओली को बचाने के लिए चीन ने भी अपने स्तर पर कई प्रयास किए। पहले प्रचंड और ओली ने सुलह करने की कोशिश की, फिर राष्ट्रपति के साथ चीनी प्रतिनिधियों की बैठकें भी हुईं, लेकिन नेपाल में ओली की सरकार बच नहीं पाई।

आपको बता दें कि 15 फरवरी 2018 को केपी शर्मा ओली दूसरी बार नेपाल के प्रधान मंत्री बने थे। उसके बाद नेपाल के भारत के साथ संबंध उनके कार्यकाल के दौरान सबसे खराब दौर से गुजरे। 20 मई 2020 को ओली कैबिनेट ने नेपाल के विवादास्पद नए नक्शे को मंजूरी दे दी थी। इसे भारत-नेपाल संबंधों के बिगड़ने का सबसे बड़ा कारक माना गया। इस नक्शे में भारत के कालापानी, लिपु लेख और लिंपियाधुरा को नेपाल में दिखाया गया था। भारत ने इस नक्शे का विरोध करते हुए एक राजनयिक नोट पेश किया था और इसे ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करार दिया। लेकिन, अब नेपाल के नये प्रधानमंत्री ने चीन के बजाए भारत के साथ संबंध को सुधारने पर जोर देने की बात कही है, वहीं नेपाली राजनीति को समझने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि देउबा भारत समर्थक माने जाते हैं और उनका प्रधानमंत्री बनना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत है।

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