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बीमारी की हालत में इंजेक्शन लगवाने से नहीं टूटता रोजा

सहारनपुर । दारुल उलूम वक्फ के वरष्ठि उस्ताद मौलाना नसीम अख्तर शाह कैसर ने कहा कि रोजों की हालत में आमतौर पर यह भ्रम रहता है कि बीमारी की हालत में इंजेक्शन लगवाने या ग्लूकोज चढ़वाने से रोजा फासिद (खत्म) हो जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। इंजेक्शन या ग्लूकोज लगवाने से रोजा नहीं टूटता है, क्योंकि इन दोनों सूरतों में ही कोई भी चीज मैदे तक नहीं पहुंचती है।

मौलाना नसीम अख्तर शाह कैसर ने बीमारी की हालत में रोजे की सूरतों पर रोशनी डालते हुए बताया कि पुस्तक अहसानुल फतावा के मुताबिक इंजेक्शन और ग्लूकोज के जरिये दी जाने वाली दवा या पानी को खाना पीना नहीं कहते हैं। जरूरत पडऩे पर रोजेदार मरीज को खून तक चढ़वाया जा सकता है। इतना ही नहीं जरूरत हो तो रोजे की हालत में दांत भी निकलवाया जा सकता है। बशर्ते कि दांत से निकलने वाला खून पेट में न जाए। इसी तरह रोजे की हालत में खून भी टेस्ट कराया जा सकता है।

मौलाना ने कहा कि अगर किसी मरीज को मुंह या नाक के जरिये ऑक्सीजन दी जाती है तो उससे भी रोजा फासिद नहीं होता है। रोजे की हालत में दिल, पेट या जिस्म के किसी भी दूसरे हिस्से का आपरेशन कराने में कोई हर्ज नहीं है। ऐंडोस्कोपी इलाज से भी रोजे को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। क्योंकि इससे पाइप के जरिए कोई भी दवा अंदर दाखिल नहीं की गई बल्कि सिर्फ मुआयना किया गया है। किसी भी तरह के जख्मों पर मरहम लगाने से भी रोजा नहीं टूटता है। जबकि दमे के मरीजों को पाउडर की शक्ल में मूंह व नाक के जरीये दी जाने वाली दवा से रोजा टूट जाएगा।

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