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गांधी पुण्यतिथि : मरना एक ‘महात्माʼ का !

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घनश्याम बादल
घनश्याम बादल

डॉ. घनश्याम बादल
आस्था और विश्वास इस देश की खास पहचान और महक है। श्रद्धा हमारे खून में रची बसी है इसी श्रद्धा ने अब तक राम और बुद्ध ही नहीं गांधी को भी जिंदा रखा है। राम और बुद्व को तो खैर हमने भगवान का दर्जा दे रखा है। पर, गांधी तो इसी युग की पैदाइश और देन हैं, हाड़ मांस, अस्थि, मज्जा के बने। कृष्काय डेढ़ पसली के आदमी। वकालत करते रेल से नीचे फेंक दिए जाने वाले, अपमान के घूंट पी जाने वाले बीसवीं सदी के आम भारतीय गांधी अचानक अपने अपमान से ऐसे गांधी हो जाते हैं जो भारतीयों को जागना व लड़ना सिखा देते हैं।
वें हिंसा के बदले हिंसा नहीं करते, न ही करवाते हैं अपितु बुद्ध से अहिंसा का अस्त्र लेते हैं तो राम से अन्याय के खिलाफ कयामत तक लड़ने का बल और उस हिंदुस्तान को आज़ाद करवा लेते हैं जो पहले सैकड़ों साल मुगलों का गुलाम रहा और फिर अंग्रेजों की दासता में पिसता आज़ादी के मायने ही भूल गया था। उसी गांधी की पुण्यतिथि है आज। एक बार फिर से शहीद दिवस है आज। भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले मोहनदास कर्मचंद गांधी की शहादत का दिन। उनकी हत्या पर रोने का दिन कहें इसे या उनके बताए रास्ते पर चलने के संकल्प दिन मानें यह हम पर है। अब हो कुछ भी पर, यह एक चमत्कारिक हस्ती की एक मदांध आदमी के हाथों रुखसती का दिन है आज।
गांधी को तब मारा गया जब सारा ज़माना, उन्हे गौर से सुन रहा था, आइंस्टीन जैसे चिंतक उन्हे एक चमत्कार बता रहे थे, देश को उनके नेतृत्व की बड़ी जरुरत थी, पर गोलियों की धांय… धांय… धांय …’’ की तीन आवाजों के साथ ‘‘हे राम…’’ कह कर वें सदा के लिए ‘ स्थिर’ हो, अमर हो गए । बावजूद सारे विरोधों व आलोचनाओं के गांधी आज भी जनमानस में ज़िदा हैं व श्रद्धा के पात्र हैं तो यह उनके बलिदान व योगदान का हासिल ही है।
तब भारत ही नहीं दुनिया भर में कोहराम, मच गया था, उन घरों में भी कई दिन चूल्हा नहीं जला जिन्होने गांधी जी को कभी देखा सुना तक ना था, तब यह थी गांधी के मरने के ग़म की आम जनकी अभिव्यक्ति जिसने बिना किसी आह्वान के गांधी की तेरहवीं मनाई।
विरोधियों के लिए गांधी लिए देवता नहीं हैं, पर अनुयायियों के लिए तो भगवान सरीखे हैं। पर एक बात पर उनके विरोधी व समर्थक दोनों सहमत हैं कि वें साधारण व्यक्ति नहीं थे। वें महामानव थे या नहीं इस पर बहस की जा सकती है। भारत ही नहीं अपितु दुनिया के दूसरे देश भी गांधी में कुछ ऐसा पाते हैं जो उन्हे उनके मरने के 70 साल बाद भी न केवल जिन्दा रखे हैं।
अपने लंबे राजनैतिक जीवन में गांधी ने कितना सही या गलत किया इस पर बहस करना गलत नहीं है पर आज उनके जाने के बाद यदि गोडसे जैसे हत्यारे के नाम पर कुछ लोग जो राजनीति करते रहे हैं यह चिंता का सबब है। उनके हत्यारे का महिमामंडन कैसे कर सकता है वह देश जिसके वें बापू व राष्ट्रपिता है।
गांधी ने देश को क्या दिया ? इस पर बहस की गुंजाइश नहीं है। हां, उनकी सोच, कार्य व सिद्धांत, जीवनशैली, उनके फैसले, भारत विभाजन पर उनकी जिद्द, पाकिस्तान को 200 करोड़ रुपए और एक बडा़ भू-भाग देने पर मत मतांतर हो सकता है। उनके अनुयाईयों व विरोधियों में इन मुद्दों पर गांधी के जाने के बाद भी बहस होती रही है और तब तक होती रहेगी जब तक गांधी का नाम रहेगा तो यह भी मान लीजिए कि यह बहस अनंत नहीं तो एक बहुत लंबे काल तक चलेगी। आप गांधी से सहमत या असहमत हो सकते हैं इसका हक आप को लोकतंत्र देता है पर उन्हे उनके किए के श्रेय से वंचित करना जायज नहीं हैं।

अगर गांधी गोडसे की गोली से बच जाते बहुत संभव था कि वें माफ कर देते या बचाने के लिए अनशन अथवा सत्याग्रह पर भी बैठ जाते मगर ऐसा हुआ नहीं और गांधी के हत्यारे के साथ कानून को जो करना था उसने किया। देश ने गांधी को आजाद होने के महज साढ़े पांच महीने दिन बाद ही लाश में तब्दील होते देखा, नफरत की पौध को हरे होते देखा, आम आदमी को उनकी मृत्यु पर बिलख – बिलख कर रोते देखा, फिर समय के साथ उनके हत्यारे को फांसी पर लटकते भी देखा। समय के साथ गोडसे अपनी नियति को प्राप्त हो गया। उसने अपनी तरफ से गांधी का ‘वध’ किया पर गांधी शरीर की सरहद तोड़ जर्रे जर्रे में समा गए और अभी भी वें अपने विचारों के माध्यम से जिंदा हैं।

मगर जिंदा होकर भी गांधी नहीं लौटे । वक्त ने उनके सपनों व गांधीवाद को तिल – तिल मरते देखा है, उनकी अहिंसा, सत्य व सत्याग्रह की नीति आज किस हाल में है सब जानते हैं। पर, यदि आज यदि गोडसे लौटता दिखता है तो यह गांधी की विरासत व सियासत दोनों के ताबूत में अखिरी कील का संकेत हैं। अब इसका क्या प्रभाव पड़ेगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
30 जनवरी 1948 को आजादी लाने वाले गांधी प्रार्थना करने आए थे , ‘सबको सन्मति दे भगवान…’ का तराना गाने आये थे । जिसे दुनिया ने ‘महात्मा’ माना , उसे एक छोटी सोच के चलते हमने अपने ही हाथों मार डाला । गांधी आम आदमी के लिए पहले भी पूज्य थे और आज भी हैं और संभवतः आगे भी रहें । गांधी की महात्मा होने की छवि हमेशा बनी रहेगी । भले ही कुछ लोग उन्हे मारते रहें ।
समय ने किसी को नहीं बख्शा ,हो सकता है गांधी भी न बख्शे जाएं , उन पर भी यदि काल की धूल चढ़ जाए तो अचरज नहीं होगा । पर , ऐसा केवल तब ही होगा जब हम उनसे ज़्यादा चमकदार शख्सियत पैदा कर सकेंगे । पर , क्या हम इस स्थिति अभी कि दूसरा गांधी पैदा कर सकें ?

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