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कुंभ मेला 2019: 50 दिन चलने वाले इस अर्द्धकुंभ की सभी महत्वपूर्ण स्नान तिथियां

MADAN GUPTA SPATU-PHOTO
ज्योतिषाचार्य मदन गुप्ता सपाटू

कुंभ का आयोजन 525 ईसा पूर्व शुरू हुआ था। माना जाता है कि 617-647 ईसवी में राजा हर्षवर्धन ने प्रयागराज में कुंभ में हिस्सा लिया था और अपना सब कुछ दान कर दिया करते थे। इससे पहले साल 2013 में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन हुआ था। अगला महाकुंभ साल 2025 में लगेगा। जनवरी 2019 में प्रयागराज में अर्धकुंभ लग रहा है। कुंभ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना है। माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसकी शुरुआत की थी, लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी।

मंथन में निकले अमृत का कलश हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक के स्थानों पर ही गिरा था, इसीलिए इन चार स्थानों पर ही कुंभ मेला हर तीन बरस बाद लगता आया है। 12 साल बाद यह मेला अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है। जबकि कुछ दस्तावेज बताते हैं कि कुंभ मेला 525 बीसी में शुरू हुआ था।
कुंभ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से है इस बारे में विद्वानों में अनेक भ्रांतियाँ हैं। वैदिक और पौराणिक काल में कुंभ तथा अर्धकुंभ स्नान में आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरूप नहीं था। कुछ विद्वान गुप्त काल में कुंभ के सुव्यवस्थित होने की बात करते हैं। परन्तु प्रमाणित तथ्य सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन 617-647 ई. के समय से प्राप्त होते हैं। बाद में श्रीमद आघ जगतगुरु शंकराचार्य तथा उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने दसनामी संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की।
1-मकर संक्रांति 14 जनवरी – कुंभ की शुरुआत मकर संक्रांति को पहले स्नान से होगी। इसे शाही स्नान और राजयोगी स्नान भी कहा जाता है। इस दिन संगम, प्रयागराज पर विभिन्न अखाड़ों के संत की पहले शोभा यात्रा निकलेंगी और फिर स्नान होगा। माघ महीने के इस पहले दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है. इसलिए इस दिन को मकर संक्रान्ति भी कहते हैं। लोग इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ दान भी करते हैं।
2. पौष पूर्णिमा 21 जनवरी-मान्यताओं के मुताबिक पौष महीने की 15वीं तिथि को पौष पूर्णिमा कहते हैं। जो कि साल 21 जनवरी को है। इस दिन चांद पूरा निकलता है। इस पूर्णिमा के बाद ही माघ महीने की शुरुआत होती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन विधिपूर्ण तरीके से सुबह स्नान करता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। वहीं, इस दिन से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत कर दी जाती है। वहीं, इस दिन संगम पर सुबह स्नान के बाद कुंभ की अनौपचारिक शुरुआत हो जाती है। इस दिन से कल्पवास भी आरंभ हो जाता है।
3. मौनी अमावस्या -4 फरवरी-तीसरा स्नान मौनी अमावस्या के दिन किया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन कुंभ के पहले तीर्थाकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और संगम के पवित्र जल में स्नान किया था। मौनी अमावस्या के दिन कुंभ मेले में बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है।
4. बसंत पंचमी -10 फरवरी-बसंत पंचमी के दिन से ही बसंत ऋ‍तु शुरू हो जाती है। कड़कड़ाती ठंड के सुस्त मौसम के बाद बसंत पंचमी से ही प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। वहीं, हिंदू मान्‍यताओं के अनुसार इस दिन देवी सरस्‍वती का जन्‍म हुआ था। इस दिन पवित्र नदियों में स्‍नान का व‍िशेष महत्‍व है। पवित्र नदियों के तट और तीर्थ स्‍थानों पर बसंत मेला भी लगता है।
5. माघी पूर्णिमा-19 फरवरी- इस दिन सभी हिंदू देवता स्वर्ग से संगम पधारे थे। वहीं, माघ महीने की पूर्णिमा (माघी पूर्णिमा) को कल्पवास की पूर्णता का पर्व भी कहा जाता है। क्योंकि इस दिन माघी पूर्णिमा समाप्त हो जाती है। इस दिन संगम के तट पर कठिन कल्पवास व्रतधारी स्नान कर उत्साह मनाते हैं। इस दिन गुरू बृहस्पति की पूजा की जाती है।
6. महाशिवरात्रि -4 मार्च-कुंभ मेले का आखिरी स्नान महा शिवरात्रि के दिन होता है। इस दिन सभी कल्पवासियों अंतिम स्नान कर अपने घरों को लौट जाते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के इस पावन पर्व पर कुंभ में आए सभी भक्त संगम में डुबकी जरूर लगाते हैं। मान्यता है कि इस पर्व का देवलोक में भी इंतज़ार रहता है।

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