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यहाँ मां-बाप करते है बेटी के लिए ग्राहक का इंतज़ार

नई दिल्ली : आज भारत में महिलाओं की स्थिती पहले की अपेक्षा अधिक मजबूत है। आज महिलाये पुरुषो के कंधे से कन्धा मिलाकर चल रहिया है परन्तु वेश्यावृति हमारे सभ्य समाज के लिए अभिशाप है। हमारे सभ्य समाज के लोगों को वेश्यावृति के बारे में बात करने में शर्म आती है क्योंकि इसे वो सही नहीं मानते, घिनौना काम मानते हैं। लेकिन मालवा अंचल में वर्षों से बेटी को सेक्स बाज़ार में धकेलने की परंपरा चली आ रही है। दरअसल इन गांवों में रहने वाले ‘बांछड़ा समुदाय’ के लिए बेटी के जिस्म का सौदा आजीविका का एकमात्र ज़रिया बना हुआ है, यहां ‘वेश्यावृती’ एक परंपरा है। हम बताते हैं आपको बांछड़ा समुदाय समुदाय के बारे में..

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डेरों में रहने वाले बांछड़ा समुदाय में प्रथा के अनुसार घर में जन्म लेने वाली पहली बेटी को जिस्मफरोशी करनी ही पड़ती है, वो इनकी कमाई का मुख्य ज़रिया है। बांछड़ा समुदाय में बेटी पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है। बेटी के जन्म की खूब धूम होती है क्योंकि ये बेटी बड़ी होकर कमाई का ज़रिया बनती है, मालवा के करीब 70 गांवों में जिस्मफरोशी की करीब 250 मंडियां हैं, जहां खुलेआम परिवार के सदस्य ही बेटी के जिस्म का सौदा करते हैं।  इस समुदाय का नियम है कि कोई भी बांछड़ा समुदाय का लड़का-लड़की प्रेम या कोई संबंध नही बना सकते है। यदि ऐसा करने की कोशिश भी कोई करता है तो उसे जमकर मारा पिटा जाता है।

आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन इस समुदाय में बेटी के जिस्म के लिए मां-बाप ग्राहक का इंतज़ार करते हैं सौदा होने के बाद बेटियां अपने परिजनों के सामने ही खुलेआम सेक्स करती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि परिवार में सामूहिक रूप से ग्राहक का इंतज़ार होता है, जिसको सेक्स के लिए आदमी पहले मिलता है उसकी कीमत परिवार में सबसे ज्यादा होती है।

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इस वजह से बांछड़ा समुदाय के अधिकांश लड़के कुंवारे ही रह जाते हैं। यहां पर ये धंधा या कहें कि गंदगी इतनी फैल चुकी है कि बाछड़ा समाज देह मंडी के रूप में कुख्यात है, जो वेश्यावृत्ति के दूसरे ठिकानों की तुलना में इस मायने में अनूठे हैं, कि यहां सदियों से लोग अपनी ही बेटियों को इस काम में लगाए हुए हैं। इनके लिए ज्यादा बेटियों का मतलब है, ज्यादा ग्राहक!

 

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